जीवन प्रेरित कहानियाँ

☀️दृष्टान्त: मेरे पाप किसके सर‼️

✴️जंगल के बीच एक वन में ऋषि मुनियों का आश्रम था। वहां पर एक महात्मा रहते थे। वह बहुत ही बुद्धिमान और हमेशा भगवान के ध्यान में लीन रहते थे। महात्मा के शिष्य अपने गुरु की महानता को देखते हुए यह कहते थे “कि उनके गुरु के पास जो भी आता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं.”ऐसा सुनकर लोग महात्मा के पास आने लगे और महात्मा जी के प्रवचन सुनकर उन्हें शांति मिलती और उन्हें यह आभास होता कि उनका मन हल्का हो गया है और उनके सारे पाप धुल गए हैं। एक दिन एक युवा वहां पर आया और महात्मा को प्रणाम किया और बोला “ऋषिवर अगर आप आज्ञा दें, तो मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ! महात्मा ने बड़े ही नम्र स्वभाव में उस युवा से कहा “तुम्हारे मन में जो भी प्रश्न है जो भी आकांक्षा है वह तुम पूछ सकते हो।

✴️युवक बोला “हे महात्मा!आप जैसा इस धरती पर कोई दूसरा महात्मा नहीं है,आप धन्य हैं,आप महान हैं। तभी महात्मा ने युवक को बीच में ही रोककर पूछा “बालक तुम मेरी इतनी प्रशंसा क्यों कर रहे हो? मैंने ऐसा क्या किया है?”तब युवक ने उत्तर दिया “मैंने आपके बारे में बहुत सुना है, कि आप लोगों से उनके पाप लेकर उन्हें पापों से मुक्ति दे देते हैं? युवक की ऐसी बातें सुनकर महात्मा हंसने लगे और बोले “हे पुत्र! यह तो लोगों का विश्वास है वरना मैं उन लोगों के पाप अपने पास नहीं रखता हूं, मैं तो हर महीने गंगा स्नान को जाया करता हूं और सब लोगों के सारे ही पाप गंगा मैया को दे देता हूँ; गंगा मैया तो लोगों के पाप धोने वाली हैं, पाप विनाशिनी हैं, उनकी महिमा अपरम्पार है, अतः यह प्रश्न लेकर तुम गंगा मैया के पास जाओ।

✴️महात्मा की ऐसी बातें सुनकर युवक ने महात्मा को प्रणाम किया और गंगा माता के पास पहुंचा और उनकी स्तुति करने लगा। तब गंगा मैया प्रकट हुई और युवक से कहा “बोलो तुम मुझसे क्या पूछना चाहते हो?” तब युवक बोला “हे मां! आप श्रेष्ठ हैं,आपका हृदय बहुत विशाल है,आप लोगों से उनके पाप लेकर इस धरती पर उपकार करती हैं,आप तो धन्य है; युवक की ऐसी बातें सुनकर गंगा मैया मुस्कुरा उठी और बोली “पुत्र मैं भला दूसरों के पाप अपने पास क्यों रखूंगी? लोग मुझे अपने पाप दे जाते हैं किंतु मैं तो उनके पाप कर्म समुद्र में डाल देती हूं और कुछ पापों को वायु देवता ले जाते हैं और कुछ पापों को सूर्य देवता सोख लेते हैं, इस तरह से मेरे पास उनका कोई भी पाप नहीं बचता और इस प्रकार मैं उनके पापों से मुक्त हो जाती हूं। यह सुनकर युवक को बड़ा आश्चर्य हुआ और कुछ सोचता हुआ वह समुद्र की ओर चल पड़ा. समुंद्र के सामने खड़े होकर समुद्र देवता की स्तुति और प्रार्थना करने लगा. युवक की प्रार्थना सुनकर समुद्र देवता प्रकट हुए और पूछा “बोल बालक क्या पूछना चाहता है?” उस युवक ने कहा- आज मुझे समझ आया है कि आपका पानी इतना खारा क्यों है? क्योंकि आप लोगों के पापों को अपने अंदर समा लेते हैं.”

✴️युवक की ऐसी बातें सुनकर समुद्र देवता हंसने लगे और बोले “हे भोले-भाले युवक! मैं भला लोगों के पापअपने पास क्यों रखूंगा? मैं उनके पाप अपने ऊपर नहीं लेता, मेरे पास तो बादल आते हैं और जल भरकर ले जाते हैं और मैं उन लोगों के सारे पाप उसे दे देता हूं, थोड़े से पाप वायु देवता ले जाते हैं और थोड़े पाप सूर्य देवता सोख ले जाते हैं। मुझे तो ईश्वर ने इसलिए खारा बनाया है, जिससे इस संसार को नमक दे सकूं। इसके बाद उस युवक ने वायु देवता की स्तुति करी वायु देवता ने बताया कि “मैं भी लोगों के पाप अपने पास नहीं रखता ,मैं आंधी-तूफान बनकर लोगों के पाप उन्हें ही लौटा देता हूँ। युवक ने फिर सूर्य देवता की स्तुति करना शुरू की और सूर्य देवता ने उस युवक को बताया कि “मैं अकाल ,सूखा और बेहद गर्मी करके लोगों के पाप उनके पास लौटा देता हूं.”और बादल ने बताया कि “मैं बाढ़ ,गंभीर वर्षा देकर लोगों के पाप उन्हें ही वापस लौटा देता हूं।

✴️यह सब बातें सुनकर युवक का मन भ्रम में पड़ गया और वह निराश हो गया और सोचने लगा, लोगों के पाप तो यह लोग भी अपने पास नहीं रखते और ब्याज सहित उन्हें वापस लौटा देते हैं तो फिर लोग क्यों इधर-उधर भटकते रहते हैं? युवक फिर से महात्मा के पास वापस लौटा और सारी बात महात्मा को विस्तार से बताई। तब महात्मा जी ने उस युवक को समझाया कि “पुत्र संसार में जो जैसा करता है उसे उसका फल अवश्य ही मिलता है। अच्छे कर्मों का फल अच्छा और बुरे कर्मों का फल बुरा मिलना पहले से ही सुनिश्चित है, यदि ईश्वर उनके कर्मों का फल उन्हें नहीं देगा तो ईश्वर न्याय कैसे करेगा और सब तरफ पाप बढ़ जाएगा, अगर किसी व्यक्ति के कर्मों का फल दूसरे को मिलने लगे और व्यक्ति के भले बुरे कर्मों को गंगा, सूर्य, वायु, जल आदि रखने लगे तो अन्याय की स्थिति हो जाएगी, अतः अपने कर्मों का फल खुद ही भुगतना पड़ता है.”यह बात सुनकर युवक का मन शांत हुआ और उसे समझ आ गया कि मनुष्य को अपना किया खुद ही भोगना पड़ता है

एक कदम आध्यात्म की ओर..