505/☑️माँ सिद्धिदात्री‼️

🛑माँ की नव शक्तियां : माता शैलपुत्री। माँ ब्रह्मचारिणी। माता चंद्रघंटा।  कूष्माण्डा माता। स्कंदमाता। माता कात्यायनी। माता कालरात्रि। माता महागौरी। माँ सिद्धिदात्री

नवदुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अंतिम हैं। अन्य आठ दुर्गाओं की पूजा उपासना शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार करते हुए भक्त दुर्गा पूजा के नौवें दिन इनकी उपासना में प्रवत्त होते हैं। इन सिद्धिदात्री माँ की उपासना पूर्ण कर लेने के बाद भक्तों और साधकों की लौकिक, पारलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। सिद्धिदात्री माँ के कृपापात्र भक्त के भीतर कोई ऐसी कामना शेष बचती ही नहीं है, जिसे वह पूर्ण करना चाहे। वह सभी सांसारिक इच्छाओं, आवश्यकताओं और स्पृहाओं से ऊपर उठकर मानसिक रूप से माँ भगवती के दिव्य लोकों में विचरण करता हुआ उनके कृपा-रस-पीयूष का निरंतर पान करता हुआ, विषय-भोग- शून्य हो जाता है।

माँ भगवती का परम सान्निध्य ही उसका सर्वस्व हो जाता है। इस परम पद को पाने के बाद उसे अन्य किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं रह जाती। माँ के चरणों का यह सान्निध्य प्राप्त करने के लिए भक्त को निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उनकी उपासना करने का नियम कहा गया है। ऐसा माना गया है कि माँ भगवती का स्मरण, ध्यान, पूजन, हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हुए वास्तविक परम शांतिदायक अमृत पद की ओर ले जाने वाला है।

मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व- ये आठ सिद्धियाँ होती हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्म खंड में यह संख्या अठारह बताई गई है। इनके नाम इस प्रकार हैं-

ऐसा विश्वास है कि इनकी आराधना से भक्त को अणिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामाव सायिता, दूर श्रवण, परकामा प्रवेश, वाकसिद्ध, अमरत्व भावना सिद्धि आदि समस्त सिद्धियों नव निधियों की प्राप्ति होती है। यदि कोई इतना कठिन तप न कर सके तो अपनी शक्तिनुसार जप, तप, पूजा-अर्चना कर माँ की कृपा का पात्र बन सकता ही है। माँ की आराधना के लिए इस श्लोक का प्रयोग होता है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में नवमी के दिन इसका जाप करने का नियम है। साधक ध्यान रखें माँ की आराधना कभी भी सिद्धियों की प्राप्ति के लिए ना करें बल्कि निष्काम भाव से ही माँ की आराधना ही करनी चाहिए।

माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है। देवी सिद्धिदात्री का वाहन सिंह है। वह कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं विधि-विधान से नौंवे दिन इस देवी की उपासना करने से सिद्धियां प्राप्त होती हैं। यह अंतिम देवी हैं। इनकी साधना करने से लौकिक और परलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। मंत्र : ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः।

🥀सिद्ध गन्धर्व यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि ! सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी !!🥀

☑️बीज मंत्र : ॐ ह्रीं क्लीं ऐं सिद्धये नम:।

भगवान शिव ने भी सिद्धिदात्री देवी की कृपा से तमाम सिद्धियां प्राप्त की थीं। इस देवी की कृपा से ही शिवजी का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण शिव अर्द्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए। मां के चरणों में शरणागत होकर हमें निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उपासना करनी चाहिए। इस देवी का स्मरण, ध्यान, पूजन हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हैं और अमृत पद की ओर ले जाते हैं।

देवी पुराण में ऐसा उल्लेख मिलता है कि भगवान शंकर ने भी इन्हीं की कृपा से सिद्धियों को प्राप्त किया था। ये कमल पर आसीन हैं और केवल मानव ही नहीं बल्कि सिद्ध, गंधर्व, यक्ष, देवता और असुर सभी इनकी आराधना करते हैं। संसार में सभी वस्तुओं को सहज और सुलभता से प्राप्त करने के लिए नवरात्र के नवें दिन इनकी पूजा की जाती है। इनका स्वरुप मां सरस्वती का भी स्वरुप माना जाता है।

माँ सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में कमलपुष्प है। सभी नौ शक्तियां माँ दुर्गा शिवा की रूप ही हैं। जिनकी अनन्त भुजाएं हैं पर अठारह भुजाएं मानकर पूजा करते हैं।

प्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह माँ सिद्धिदात्री की कृपा प्राप्त करने का निरंतर प्रयत्न करे। उनकी आराधना की ओर अग्रसर हो। इनकी कृपा से अनंत दुख रूप संसार से निर्लिप्त रहकर सारे सुखों का भोग करता हुआ वह मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।

🥀या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।🥀

✔️अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ सिद्धिदात्री के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे अपनी कृपा का पात्र बनाओ।

🌹ध्यान स्तुति :

*वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
*कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम्॥
*स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्।
*शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धीदात्री भजेम्॥
*पटाम्बर, परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
*मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
*प्रफुल्ल वदना पल्लवाधरां कातं कपोला पीनपयोधराम्।
*कमनीयां लावण्यां श्रीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

🌹स्तोत्र पाठ :

*कंचनाभा शखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो।
*स्मेरमुखी शिवपत्नी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
*पटाम्बर परिधानां नानालंकारं भूषिता।
*नलिस्थितां नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोअस्तुते॥
*परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।
*परमशक्ति, परमभक्ति, सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
*विश्वकर्ती, विश्वभती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।
*विश्व वार्चिता विश्वातीता सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
*भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी।
*भव सागर तारिणी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
*धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनी।
*मोक्षदायिनी सिद्धीदायिनी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥

✔️मंत्र :

1. अमल कमल संस्था तद्रज:पुंजवर्णा ; कर कमल धृतेषट् भीत युग्मामबुजा च।

🥀मणिमुकुट विचित्र अलंकृत कल्प जाले ; भवतु भुवन माता संत्ततम सिद्धिदात्री नमो नम:।🥀

2. ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः।

3. माँ का बीज मंत्र : ॐ ह्रीं क्लीं ऐं सिद्धये नम:।
                                ********

🛑मां सिद्धिदात्री की आरती !!

✴️जय सिद्धिदात्री मां, तू सिद्धि की दाता।
✴️तू भक्तों की रक्षक, तू दासों की माता।
✴️तेरा नाम लेते ही मिलती है सिद्धि।
✴️तेरे नाम से मन की होती है शुद्धि।
✴️कठिन काम सिद्ध करती हो तुम।
✴️जभी हाथ सेवक के सिर धरती हो तुम।
✴️तेरी पूजा में तो ना कोई विधि है।
✴️तू जगदम्बे दाती तू सर्व सिद्धि है।
✴️रविवार को तेरा सुमिरन करे जो।
✴️तेरी मूर्ति को ही मन में धरे जो।
✴️तू सब काज उसके करती है पूरे।
✴️कभी काम उसके रहे ना अधूरे।
✴️तुम्हारी दया और तुम्हारी यह माया।
✴️रखे जिसके सिर पर मैया अपनी छाया।
✴️सर्व सिद्धि दाती वह है भाग्यशाली।
✴️जो है तेरे दर का ही अम्बे सवाली।
✴️हिमाचल है पर्वत जहां वास तेरा।
✴️महा नंदा मंदिर में है वास तेरा।
✴️मुझे आसरा है तुम्हारा ही माता।
✴️भक्ति है सवाली तू जिसकी दाता।

माँ दुर्गा के सिद्धिदात्री रूप की पूजा विधि !!

☑️दुर्गा पूजा में इस तिथि को विशेष हवन किया जाता है। यह नौ दुर्गा का आखरी दिन भी होता है तो इस दिन माता सिद्धिदात्री के बाद अन्य देवताओं की भी पूजा की जाती है।

☑️सर्वप्रथम माता जी की चौकी पर सिद्धिदात्री माँ की तस्वीर या मूर्ति रख इनकी आरती और हवन किया जाता है।

☑️हवन करते वक्त सभी देवी दवताओं के नाम से हवि यानी अहुति देनी चाहिए।

☑️बाद में माता के नाम से अहुति देनी चाहिए।

☑️दुर्गा सप्तशती के सभी श्लोक मंत्र रूप हैं अत:सप्तशती के सभी श्लोक के साथ आहुति दी जा सकती है। देवी के बीज मंत्र “ऊँ ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमो नम:” से कम से कम 108 बार हवि दें।

☑️भगवान शंकर और ब्रह्मा जी की पूजा पश्चात अंत में इनके नाम से हवि देकर आरती करनी चाहिए। हवन में जो भी प्रसाद चढ़ाया है जाता है उसे समस्त लोगों में बांटना चाहिए।***

!! धन्यवाद !!

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s