506/☑️माँ महागौरी‼️

🛑माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है। इनकी उपासना से भक्तों के सभी कल्मष धुल जाते हैं, पूर्वसंचित पाप भी विनष्ट हो जाते हैं। भविष्य में पाप-संताप, दैन्य-दुःख उसके पास कभी नहीं जाते। वह सभी प्रकार से पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी हो जाता है। माँ का वर्ण पूर्णतः गौर है। इस गौरता की उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। इनकी आयु आठ वर्ष की मानी गई है- ‘अष्टवर्षा भवेद् गौरी।’ इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं। माता महागौरी की चार भुजाएँ हैं। इनका वाहन वृषभ है। इनके ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है। ऊपरवाले बाएँ हाथ में डमरू और नीचे के बाएँ हाथ में वर-मुद्रा हैं। इनकी मुद्रा अत्यंत शांत है

☑️माँ महागौरी मंत्रः  ॐ महागौरियेः नमः।   (इस मंत्र का 108 बार जाप करें)

🥀श्वेत वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बर धरा शुचि:।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा॥🥀

🛑माँ महागौरी ने देवी पार्वती रूप में भगवान शिव को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी, एक बार भगवान भोलेनाथ ने पार्वती जी को देखकर कुछ कह देते हैं। जिससे देवी के मन का आहत होता है और पार्वती जी तपस्या में लीन हो जाती हैं। इस प्रकार वषों तक कठोर तपस्या करने पर जब पार्वती नहीं आती तो पार्वती को खोजते हुए भगवान शिव उनके पास पहुँचते हैं वहां पहुंचे तो वहां पार्वती को देखकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं। पार्वती जी का रंग अत्यंत ओजपूर्ण होता है, उनकी छटा चांदनी के सामन श्वेत और कुन्द के फूल के समान धवल दिखाई पड़ती है, उनके वस्त्र और आभूषण से प्रसन्न होकर देवी उमा को गौर वर्ण का वरदान देते हैं।

🛑अष्टमी के दिन महिलाएं अपने सुहाग के लिए देवी मां को चुनरी भेंट करती हैं। देवी गौरी की पूजा का विधान भी पूर्ववत है अर्थात जिस प्रकार सप्तमी तिथि तक आपने मां की पूजा की है उसी प्रकार अष्टमी के दिन भी प्रत्येक दिन की तरह देवी की पंचोपचार सहित पूजा करते हैं। माँ महागौरी का ध्यान, स्मरण, पूजन-आराधना भक्तों के लिए सर्वविध कल्याणकारी है। हमें सदैव इनका ध्यान करना चाहिए। इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है। मन को अनन्य भाव से एकनिष्ठ कर मनुष्य को सदैव इनके ही पादारविन्दों का ध्यान करना चाहिए।

🛑मां महागौरी भक्तों का कष्ट अवश्य ही दूर करती है। इसकी उपासना से अर्तजनों के असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। अतः इसके चरणों की शरण पाने के लिए हमें सर्वविध प्रयत्न करना चाहिए। माता महागौरी के पूजन से सभी नौ देवियां प्रसन्न होती है। पुराणों में माँ महागौरी की महिमा का प्रचुर आख्यान किया गया है। ये मनुष्य की वृत्तियों को सत्‌ की ओर प्रेरित करके असत्‌ का विनाश करती हैं। हमें प्रपत्तिभाव से सदैव इनका शरणागत बनना चाहिए।

🥀या देवी सर्वभू‍तेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥🥀

☑️अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ गौरी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। हे माँ, मुझे सुख-समृद्धि प्रदान करो।

🛑एक कथा अनुसार भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी जिससे इनका शरीर काला पड़ जाता है। देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान इन्हें स्वीकार करते हैं और शिव जी इनके शरीर को गंगा-जल से धोते हैं तब देवी विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो जाती हैं तथा तभी से इनका नाम गौरी पड़ा। महागौरी रूप में देवी करूणामयी, स्नेहमयी, शांत और मृदुल दिखती हैं। देवी के इस रूप की प्रार्थना करते हुए देव और ऋषिगण कहते हैं “सर्वमंगल मंग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके. शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते..”। महागौरी जी से संबंधित एक अन्य कथा भी प्रचलित है इसके जिसके अनुसार, एक सिंह काफी भूखा था, वह भोजन की तलाश में वहां पहुंचा जहां देवी उमा तपस्या कर रही होती हैं। देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ गयी परंतु वह देवी के तपस्या से उठने का इंतजार करते हुए वहीं बैठ गया। इस इंतजार में वह काफी कमज़ोर हो गया। देवी जब तप से उठी तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस पर बहुत दया आती है और माँ उसे अपना सवारी बना लेती हैं क्योंकि एक प्रकार से उसने भी तपस्या की थी। इसलिए देवी गौरी का वाहन बैल और सिंह दोनों ही हैं।

☑️माँ जगतजननी के महागौरी स्वरूप की पूजा विधि !!

1. ज्योतिषाचार्य के अनुसार अष्टमी के दिन महिलाएं अपने सुहाग के लिए देवी मां को चुनरी भेंट करती हैं।

2. सबसे पहले लकड़ी की चौकी पर या मंदिर में महागौरी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।

3. इसके बाद चौकी पर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर महागौरी यंत्र रखें और यंत्र की स्थापना करें।

4. मां सौंदर्य प्रदान करने वाली हैं। हाथ में श्वेत पुष्प लेकर मां का ध्यान करें।

5. अष्टमी के दिन कन्या पूजन करना श्रेष्ठ माना जाता है।

6. कन्याओं की संख्या 9 होनी चाहिए नहीं तो 2 कन्याओं की पूजा करें। कन्याओं की आयु 2 साल से ऊपर और 10 साल से अधिक न हो।

7. भोजन कराने के बाद कन्याओं को दक्षिणा देनी चाहिए।

☑️ध्यान मंत्र:

*वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
*सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम्॥
*पूर्णन्दु निभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्।
*वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥
*पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
*मंजीर, हार, केयूर किंकिणी रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
*प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वाधरां कातं कपोलां त्रैलोक्य मोहनम्।
*कमनीया लावण्यां मृणांल चंदनगंधलिप्ताम्॥

☑️स्तोत्र मंत्र पाठ:

*सर्वसंकट हंत्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।
*ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥
*सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रदीयनीम्।
*डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥
*त्रैलोक्यमंगल त्वंहि तापत्रय हारिणीम्।
*वददं चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥

☑️माता के 32 नामों की माला :

1) दुर्गा   2) दुर्गार्तिशमनी   3) दुर्गाद्विनिवारिणी 4) दुर्गमच्छेदनी   5) दुर्गसाधिनी 6) दुर्गनाशिनी 7) दुर्गतोद्धारिणी 8) दुर्गनिहन्त्री  9) दुर्गमापहा 10) दुर्गमज्ञानदा  11) दुर्गदैत्यलोकदवानला 12) दुर्गमा   13) दुर्गमालोका   14) दुर्गमात्मस्वरुपिणी  15) दुर्गमार्गप्रदा 16) दुर्गमविद्या  17) दुर्गमाश्रिता 18) दुर्गमज्ञानसंस्थाना    19) दुर्गमध्यानभासिनी 20) दुर्गमोहा   21) दुर्गमगा 22) दुर्गमार्थस्वरुपिणी   23) दुर्गमासुरसंहंत्रि 24) दुर्गमायुधधारिणी   25) दुर्गमांगी 26) दुर्गमता 27) दुर्गम्या 28) दुर्गमेश्वरी   29) दुर्गभीमा 30) दुर्गभामा  31) दुर्गभा 32) दुर्गदारिणी ।

इसके आखिरी में ये जरूर बोलें-  जो भी इन 32  नामों का पाठ करता है; उसके सभी शत्रुओं का मां दुर्गा विनाश कर देती है और उसे सुखी जीवन का आशीर्वाद देती है।***

!! धन्यवाद !!

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