Category Archives: आध्यात्मिक सुविचार/लेख

20/☑️यात्रा पूरी करें‼️

🛑कभी कभी कुछ साधु युवा मित्रों का पोस्ट अचानक सामने आ जाता हैं। उनके विचार पढ़कर बड़ी हैरानी होती हैं। उनकी बात, विचार धार्मिक मानसिक कुंठा से युक्त भेदभाव वाला होता हैं। आज का लेख उन्हीं सज्जन मित्रों को समर्पित हैं। कोई भी धर्म, मत, मतांतर, योग हो..सगुण उपासक हो या निर्गुण, रास्ते भले ही अलग अलग हो पर अंत मे सबका गंतव्य और प्राप्ति एक ही हैं। कोई भी साधक योगी हो, गुरू हो जबतक उसकी साधना की पूर्णाहुति नहीं हो जाती परमात्मा का अनुभव स्वं से नही हो जाता और शिवत्व पर टिकता नही..तबतक तर्क, वितर्क, कुतर्क, भेद बुद्धि से बचें। किताबी ज्यादा ज्ञान भी कभी कभी मुस्किले जान हो जाता हैं। वेद, शास्त्रों के ज्ञाता रावण की तरह महापंडित हो सकते हैं, चंद तुच्छ सिद्धि-प्रसिद्धि भी प्राप्त कर सकते हैं पर प्रज्ञा कुंठित ही रहती हैं। आगे का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। महात्मा विदुर जैसों को ही भगवान दिखाई देते हैं चाहे वो किसी रूप मे क्यू ना हो। रावण जैसों को नही। मानव रूप मे कइयों बार सामना होने पर भी उसे एक साधारण वनवासी समझने की भूल कर बैठता है। अहंकार के कारण समझाने पर भी अपने छोटे भाई विभीषण या पत्नी की भी बात नहीं मानता। कारण आखों पर मैं-पना, महापंडित, महाबली, राजा और सिद्धियों से अलंकृत चश्मा लगाए था। प्रज्ञा कुंठित थी। खैर आगे बढ़ते हैं ?

🛑बुद्धि स्थूल है प्रज्ञा जागृत नहीं है अवचेतन मन मे पड़ा कचड़ा अभी साफ नहीं हुआ है, साधना पूरी नहीं हुई आधे- अधूरे हैं तो फिर वो योगी हो, सन्यासी हो, साधक हो, शास्त्रों को ज्ञाता महापंडित हो, ज्ञानी हो, बड़ा गुरू हो, गृहस्थ या फिर कोई और भेद बुद्धि बनी रहेगी। वो अपने ज्ञान, अपने गुरू, अपनी परम्परा, अपने संप्रदाय, अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ होने का ही गाना गायेंगा। इससे इतर दूसरे संप्रदाय और प्राचीन महापुरुषों को जिसे उसने कभी देखा भी नहीं मात्र सुनकर या पढ़कर उसे निम्न बता देगा। अंतर पूरे तीन-तेरह का। माना कि आपका धर्म और गुरू, परम्परा सबसे अच्छा उच्च कोटि का है पर अन्य का निम्न हैं, कैसे कह सकते हैं। अंतर 19, 20 का होना चाहिये ना कि 3 और तेरह का। आर्यसमाजी, मुस्लिम धर्म के लोग, मुहम्मद साहेब, संत कबीर, महात्मा बुद्ध आदि मूर्तिपूजा  को नही मानते तो क्या सभी गलत है या जो सनातनी मूर्ति को मानते हैं वो गलत हैं। सबसे पहले धर्म कोई भी हो सम्मान करना सीखें।

🛑कोई भी देहधारी नहीं कह सकता कि वो 100 %शुद्ध हैं चाहे वो कितना भी बड़ा गुरू हो। कमियाँ ईश्वर जब देह धारण करते हैं तो उनमें भी मुर्ख लोग निकल देते हैं। उनकी नजर दूसरे के ही थाली पर रहती हैं। कभी भी वो अपने अंदर नहीं देखते। बहुत से साधक ध्यान लगाकर समाधिस्थ हो जाते हैं। उसके लिए वो कठिन साधना भी करते हैं। सिद्धि, प्रसिद्धि भी मिल जाती हैं। जब तक समाधि मे हैं तब तक ठीक। कब तक समाधि मे रहेंगे। उतारते ही फिर चंचल मन और इन्द्रियों के गुलाम बन जाते हैं। फिर वही वेदों और शास्त्रों के ज्ञान मे उलझ जाते हैं। प्रपंच पीछा नहीं छोड़ता। और दूसरों को भी परोसने लगते हैं। वेद के तथ्यों तक नहीं पहुंच पाते और भ्रमित रहते हैं। 10 लाख कोई उन्हें पकड़ाए तुरंत उनका ईमान डगमगा जाता हैं। भाई शिव तक पहले अपनी पहुंच बनाओ। शिव को आत्मसात करों। अपने जीवन मे उतारो। उनकी नजर से देखों फिर असल पता चल जायेगा। अधूरे ज्ञान को परिपक्व होने दे फिर बताये कौन क्या है।

🛑संत कबीर, महात्मा बुद्ध, तुलसीदास जी और भी बहुत से इस घोर कलयुग मे ऐसे साधु महापुरुष है जो किसी प्रसिद्धि, आश्रमों की घुड़दौड़ या भगवा-स्वेत रूप के मोहताज नहीं थे। उन्होंने कभी वेद पुराण नहीं पढ़ा और ना ही कभी पुराणों के दर्शन किए फिर भी उनकी वाणी उनके कर्म मे आप वेद, पुराण, गीता के दर्शन कर सकते हैं। उनके मुख् से निकला हर शब्द वेदों का सार ही होता हैं। वो उस परमात्मा से सतत जुड़े होते हैं जहां से अनेकानेक सृष्टि की नित उत्पति एवं विसर्जन होता हैं। जो आप पूर्ण समाधि मे अनुभव करते होगे, वो खुली आखों से हर एक पल दर्शन करते हैं। उन्हें पहचानने के लिए आपको अपनी तीब्र प्रज्ञा जागृत करनी होगी। उसके लिए आपको स्वतः ही बिना गुरू के अनुसंधान करना होगा। दूसरे के बताये रास्ते पर चलकर आप कभी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकते। क्योंकि उस रास्ते पर सिर्फ आपके अपने विचार, विवेक और निःस्वार्थ कर्म के अलावा कोई और मदद नहीं कर सकता।

कोई जरूरी नही कि इसके लिए कठिन तप ही करना पड़े। ईश्वर सहज रूप हैं..निष्कपट, निश्छल, भोलेपन और सहजता से जल्दी मिल जाते हैं उन्हें खोजना नही पड़ता बल्कि वही दौड़े चले आते हैं। हमारे  हर एक अहसास मे उनका समागम होता हैं। तार्किक बुद्धि, ज्ञानी, प्रसिद्धि की चाह, गुरू का ज्ञान बांटने वाले को कभी नहीं मिलते। वो लोग सिर्फ झूट एवं रटंत विद्या ही लोगों मे परोसते हैं। तंत्र-मंत्र के मकड़जाल मे खुद भी भ्रमित होते हैं और दूसरों को भी करते हैं।°°°     

*༺✴️‼️#प्रपंच_से_परे_वो_शिव_हैं‼️✴️༻* 

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°°°•••✳️॥>!धन्यवाद!<॥✳️•••°°°

                 

19/☑️सृजन की दौलत‼️

🛑आपको किस चीज से खुशी मिलती है ? इस प्रश्न के कई जवाब हो सकते हैं, जैसे अच्छे भोजन से, अच्छी जगहों पर घूमने से या अच्छे कपड़े पहनन से। पर ये खुशियां तो अस्थाई ही होंगी। इन्हें स्थाई करना है, तो अपने भीतर आनंद के एक निरंतर बनने वाले स्रोत को जगाना होगा। चार्ल्स डिकेंस कहते थे- आपको हमेशा खुशियों की दरकार है, तो फिर सृजन करते रहना होगा। ऐसे में, आपके कष्ट भी आनंद में बदल जाएंगे। यह करीब – करीब बच्चे को जन्म देने जैसा है । कष्ट होता है, पर मां खुशियों से भर उठती है।

🛑मार्टिन लूथर जूनियर ने श्वेत-अश्वेत संघर्ष के दौरान एक भाषण में कहा था कि भले आप सड़क पर झाडू लगाने वाले कर्मचारी हों, पर अपने काम को इस तरह से करें कि कोई और इस तरह काम न कर सके। यही सृजन है। सृजन नहीं किया, तो आपका काम सिर्फ मेहनत रह जाएगा।

🛑अध्यात्म में भी कहा जाता है- अपनी मेहनत या किसी भी कार्य को परम शक्ति से जरूर जोड़िए, उससे अतिरिक्त ऊर्जा मिलने से सृजन आसान हो जाता है। यदि आपने सृजन नहीं, केवल कर्म किया, तो मेहनत आपको अशांत करेगी। इतना थकाएगी कि आप उदास हो जाएंगे, जबकि सृजन आपको खुशियों से भरेगा। आज दुनिया में कुछ लोग ही होंगे, जो पूरी तरह खुश हैं, बाकी या तो आंशिक खुश हैं या फिर निराश, क्योंकि ज्यादातर लोगों ने अपने कर्म को सृजन की दिशा में नहीं मोड़ा है । जो सर्जक हैं, वे भी अपनी खुशियों को बांटने में कंजूस रहे हैं। दूसरों को उन्होंने सृजन का मतलब समझाया नहीं है। यह समझाने में चूक गए हैं कि काम से पाई गई खुशी ही असली दौलत है।

इसलिए मित्रों, इस समय का कर्तव्य है आप घर मे रहे, कम मे काम चलाए अपने गृहकार्य, सफाई आदि को स्वम करे, जितनी जरूरत हो उतना ही घर मे रखे। स्वाध्याय, पूजा, योग, जप, ध्यान आदि अपनी प्रकृतनुसार करे  वो भी पूरे मन से..कोशिश करे और अपने समस्त कार्य को परम सत्ता “शिव” की प्रसन्नता से जोड़ दे। कल की चिंता कल पर छोड़ दें, कल किसने देखा..? आज मे खुश रहें। अपने से दूर स्वजनों से फोन पर बात करते रहें। बाकी तो आप स्वतः ज्ञानी हैं।°°°

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°°°•••✳️॥>!धन्यवाद!<॥✳️•••°°°

18/☑️साधक संजीवनी‼️

🎯अच्छी बातेँ, अच्छे अनुकूल विचार, सहज साधना जहाँ से मिले उठा ले और शुरू हो जाये।

🎯कोई भी ज्ञान या साधना जो आपको असहज करता हैं उस ज्ञान या साधना का कोई महत्व नही हैं। ज्यादा नही टिकता।

🎯गुरू आप स्वं है अपने को पहचानें। जब आप पूर्ण शिष्य बन जाते है, पक जाते हैं तो समय आने पर ईश्वर खुद ही माध्यम देते हैं। पर्दा उठाने के लिए गुरू के पास जाने की जरूरत नहीं। परमात्मा किसी ना किसी रूप मे किसी के माध्यम से कार्य पूर्ण कर देते हैं। वो किसी का एक फोन कॉल या एक मैसेज भी हो सकता है।

🎯अपनी प्रकृति के साथ खिलवाड़ ना करें आप जैसे भी है अच्छे है। ईश्वर का अनुपम उपहार हैं। ईश्वर अति सहज है, उसे सहज और निर्दोष होकर ही प्राप्त किया जा सकता हैं। अपने को तपा-गला कर सिर्फ चंद सिद्धियां ही प्राप्त की जा सकती हैं ईश्वर को नही।

🎯आध्यात्म में जल्दीबाजी नहीं चलती। अनगिनत जन्मों के संचित कर्म होते हैं। जो धीरे धीरे कटते हैं उसे आप ही काट सकते हैं। एक एक कदम मजबूती के साथ बढ़ाते रहें।

🎯किसी लालच, गुरू या सिद्ध बनने के लिए आध्यात्मिक मार्ग ना चुने फिर तो आप जो कर रहें हैं वही सही है। जीवन के परेशानियों से निजात पाने के लिए भी यह मार्ग ना चुने।

🎯आप मुझे नही जानते, भौतिक रूप से मैं भी आपको नहीं जनता फिर भी हमारे मध्य विचारों का प्रवाह चल रहा हैं। मेरें-आपके बीच मे मौन संबाद हो रहा है। माध्यम शिव ही हैं!

🎯एक अक्षर, एक शब्द एक वाक्य..मे इतना सामर्थ्य है कि ड्राइवर की तरह आपको अपने गंतव्य तक पहुंचा सकता है बशर्ते आप उसको आत्मसात करे और स्वम चलने का सतत अभ्यास करें। मंजिल दूर नहीं। उस ड्राइवर के हाथ मे सौप दे अपने को। भूल जाये मैं, कौन, क्या, ये वो।°°°

     

*༺️ॐ✴️~नमो आदिशंकरमहादेव~✴️ॐ️༻*
*༺꧁‼️हर हर हरे हरे‼️꧂༻*
°°°•••✳️॥>!धन्यवाद!<॥✳️•••°°°

     

17/☑️सत्संग की महिमा‼️

दृष्टांत: दोस्तों, एक बार देवर्षि नारद भगवान विष्णु के पास गए और प्रणाम करते हुए बोले, “भगवान मुझे सत्संग की महिमा सुनाइये।” भगवान मुस्कराते हुए बोले, नारद! तुम यहां से आगे जाओ, वहां इमली के पेड़ पर एक रंगीन प्राणी मिलेगा। वह सत्संग की महिमा जानता है, वही तुम्हें भी समझाएगा भी।

नारद जी खुशी-खुशी इमली के पेड़ के पास गए और गिरगिट से बातें करने लगे। उन्होंने गिरगिट से सत्संग की महिमा के बारे में पूछा। सवाल सुनते ही वह गिरगिट पेड़ से नीचे गिर गया और छटपटाते हुए प्राण छोड़ दिए। नारदजी आश्चर्यचकित होकर लौट आए और भगवान को सारा वृत्तांत सुनाया।

भगवान ने मुस्कराते हुए कहा, इस बार तुम नगर के उस धनवान के घर जाओ और वहां जो तोता पिंजरे में दिखेगा, उसी से सत्संग की महिमा पूछ लेना। नारदजी क्षण भर में वहां पहुंच गए और तोते से सत्संग का महत्व पूछा। थोड़ी देर बाद ही तोते की आंखें बंद हो गईं और उसके भी प्राणपखेरू उड़ गए। इस बार तो नारद जी भी घबरा गए और दौड़े-दौड़े भगवान कृष्ण के पास पहुंचे।

नारद जी कहा, भगवान यह क्या लीला है। क्या सत्संग का नाम सुनकर मरना ही सत्संग की महिमा है ?” भगवान हंसते हुए बोले, यह बात भी तुमको जल्द ही समझ आ जाएगी। इस बार तुम नगर के राजा के महल में जाओ और उसके नवजात पुत्र से अपना प्रश्न पूछो।”

नारदजी तो थरथर कांपने लगे और बोले, अभी तक तो पक्षी ही अपने प्राण छोड़ रहे थे। इस बार अगर वह नवजात राजपुत्र मर गया तो राजा मुझे जिंदा नहीं छोड़ेगा।” भगवान ने नारदजी को अभयदान दिया। नारदजी दिल मुट्ठी में रखकर राजमहल में आए। वहां उनका बड़ा सत्कार किया गया। अब तक राजा को कोई संतान नहीं थी। अतः पुत्र के जन्म पर बड़े आनन्दोल्लास से उत्सव मनाया जा रहा था

नारदजी ने डरते-डरते राजा से पुत्र के बारे में पूछा। नारदजी को राजपुत्र के पास ले जाया गया। पसीने से तर होते हुए, मन-ही-मन श्रीहरि का नाम लेते हुए नारदजी ने राजपुत्र से सत्संग की महिमा के बारे में प्रश्न किया तो वह नवजात शिशु हंस पड़ा और बोलाः “महाराज! चंदन को अपनी सुगंध और अमृत को अपने माधुर्य का पता नहीं होता। ऐसे ही आप अपनी महिमा नहीं जानते, इसलिए मुझसे पूछ रहे हैं।

वास्तव में आप ही के क्षणमात्र के संग से मैं गिरगिट की योनि से मुक्त हो गया और आप ही के दर्शनमात्र से तोते की क्षुद्र योनि से मुक्त होकर इस मनुष्य जन्म को पा सका। आपके सान्निध्यमात्र से मेरी कितनी सारी योनियां कट गईं और मैं सीधे मानव-तन में ही नहीं पहुंचा अपितु राजपुत्र भी बना। यह सत्संग का ही अदभुत प्रभाव है। बालक बोला- हे ऋषिवर, अब मुझे आशीर्वाद दें कि मैं मनुष्य जन्म के परम लक्ष्य को पा लूं।

नारदजी ने खुशी-खुशी आशीर्वाद दिया और भगवान श्री हरि के पास जाकर सब कुछ बता दिया। भगवान ने कहा, सचमुच, सत्संग की बड़ी महिमा हैं। मित्रों, सत का सानिध्य और उसकी महिमा बड़ी निराली हैं जो उनके सच्चे प्रेमी भक्त ही जानते हैं !°°°

*༺⚜️꧁✴️‼️महामाया हरे-हरे‼️✴️꧂⚜️༻*
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16/☑️बलैन्क ना छोड़े कुछ भी‼️

🎯ध्यान रखें मित्रों, कोई भी, किसी भी मित्र के द्वारा अपने पेज पर डाला गया भगवान का चित्र या सुविचार ज्यादा देर तक खाली (blank) नहीं रहना चाहिए यद्यपि वो शेयर किया ही क्यू ना हो! कम से कम नजर पड़ते ही उसे लाइक अवश्य करें। पहला लाइक और कमेन्ट मे आराध्य का नाम लिखना बहुत मायने रखता हैं। उसी तरह अपना घर, वस्तु, कोना और स्वं-परिवार को भी दिव्यता, प्रेम और अच्छाईयों से भरें।

🎯आध्यात्म में प्रणाम का बहुत महत्व हैं। प्रणाम करते समय ये ना सोचे कि वो आपसे छोटा होगा या बड़ा। बस कर ले। भगवान ने मूर्खों के लिए बड़ी बड़ी साधना बनाया। वो जानते हैं संसार मे एक से बड़े एक मुर्ख हैं जो कुछ पाने के लिए कुछ भी करेंगे। बड़ी-बड़ी साधना करने से तुच्छ सिद्धि मिल सकती हैं भगवान नहीं। सहज, समान, निष्कपट और प्रणाम सिर्फ ये चार पुष्प ईश्वर को पसंद हैं अर्पित करने होते हैं। ईश्वर खुद ही आ जाएंगे। खोजने की आवश्यकता नहीं हैं।°°°

*༺️ॐ✴️~नमो आदिशंकरमहादेव~✴️ॐ️༻*
*༺꧁‼️हर हर हरे हरे‼️꧂༻*

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