☀️प्रतिशोध का तरीका अपना-अपना‼️

◾हम अक्सर बदला लेने की ताक में रहते हैं। जिन्होंने हमारा दिल दुखाया हो, वे हमें रास नहीं आते और जिन बातों से हमारा दिल दुखा हो, उनको ढोना हमारी आदत हो जाती है। कई बार हम लाठी का जबाब गोली से देते हैं। अभी हाल मे ही एक ऑलंपिक गोल्डमेडल पहलवान का वाक्या सामने आया उसने और उसके सरफिरे मित्रों ने किसी अपने मित्र की एक छोटी सी बात पर बेवजह पीट-पीट का मार डाला और नतीजा पूरा कैरियर दाव पर लग गया। आपने सुना होगा। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं। हमारी मनमानी और ईश्वर प्रदत्त शक्ति का दुरुपयोग हमे जिंदाजी अंधकार मे धकेल देती हैं। जहां से वापस लौटना बड़ा दुष्कर होता हैं। क्या वो ज्ञानी नहीं होते। वो भी दूसरों को ज्ञान देते हैं पर एक छोटी सी मनमुख घटना भविष्य का पूरा भूगोल बदल कर रख देती हैं।

◾यकीनन, हम अच्छे होते हैं और अच्छा चाहते हैं पर सामने वाले की बुराई हमें उसके प्रति उसी कार्य के लिए उकसाती है, जिसे करके वह अच्छे लोगों की जमात से बाहर हो जाता है। तो हमें करना क्या चाहिए? आदर्श स्थिति तो यह है कि आप उसकी सोच के बिल्कुल विपरीत व्यवहार करें। यह नाटक की तरह होगा, मजेदार भी, और बहुत संभव है कि उस व्यक्ति मे बड़ा बदलाव भी आ जाए।

◾चर्चित वाकया है- राष्ट्रपति बनने के बाद नेल्सन मंडेला एक रेस्तरां में अपने सुरक्षा अधिकारी के साथ खाना खाने पहुंचे। मंडेला की केबिन के बाहर एक व्यक्ति अपनी सीट पर बैठा खाना आने का इंतजार कर रहा था। मंडेला ने रेस्तरां के मैनेजर से कहा कि उस व्यक्ति को उनके साथ बिठाया जाए। मंडेला ने उस व्यक्ति का भी खाना मंगाया और सभी भोजन करने लगे। खाते वक्त उस व्यक्ति के हाथ कांप रहे थे। खाना खत्म करने के बाद उसने दबी जुबान से मंडेला का आभार जताया और बाहर निकल गया।

◾उसके जाने के बाद सुरक्षा अधिकारी ने मंडेला से कहा- वह शायद बहुत बीमार थे, खाते समय उसके हाथ लगातार कांप रहे थे! मंडेला ने कहा- दरअसल वह उस जेल का जेलर था, जहां मैं कैद था। इसके आदेश पर मुझे निरंतर यातनाएं दी गई। उसने सोचा होगा कि मैं अब उसके साथ वैसा ही व्यवहार करूंगा। उसके हाथ इसी आशंका से कांप रहे थे। पर मैं जानता हूं, मैंने उससे अपना बदला ले लिया है, उसके भीतर की बुराई को अपने तरीके से चोट पहुंचाकर।**                             

☀️प्राकृतिक उम्र के साथ जिये‼️

◾व्यक्ति सेवानिवृत्त होता है, तो वह चाहे कितना भी सक्रिय हो, मित्र-रिश्तेदार उसे याद दिलाते रहते हैं कि वह बूढ़ा हो गया है। पेंशनजीवियों के वाट्सएप ग्रुप पर संदेश भी ऐसे ही डाले जाते हैं और इस सच्चाई से मुलाकात कराने के लिए एक-दूसरे की वाह-वाह की जाती है। दूसरी तरफ, जवान लगने के लिए सिर पर बचे दो सौ पैंसठ बाल भी काले किए जाते हैं।

◾दरअसल, बढ़ती उम्र एक खेल है, जिसे हमारा शरीर और मन मिलकर खेलते हैं। शरीर कुछ और करना चाहता है, लेकिन मन कुछ और ही बांचता है। सवाल यह है कि हम अपने को कम उम्र क्यों समझना चाहते हैं? इंसान खुद को वास्तविक उम्र से छोटा मानने और उससे भी छोटी उम्र का दिखने में लगा रहता है। वह भूल जाता है कि जब उम्र कम थी, तब वह मैच्योर दिखना चाहता था। अब जब काफी परिपक्व हो चुका है, तब कमउम्र दिखना चाहता है। मेकअप और स्वांग से भरे इस नजरिए से हम अपने वर्तमान जीवन और शरीर के प्रति असंतोष बढ़ाते हुए अपने जीने की गुणवत्ता ही कम कर रहे होते हैं।

◾इंसान सुंदर और जवान दिखने, अपने चेहरे की झुर्रियों को रोकने, सदा युवा बने रहने के लिए जड़ी-बूटियां, लोशन, सर्जरी और ना जाने क्या क्या तलाश करता रहता है, लेकिन जिंदगी जीने की असली बूटी को नकारता रहता है। आपने बड़े बड़े सेलिब्रिटी को देखा होगा बड़े-छोटे पर्दे पर। सुन्दर दिखते हैं। अपना पूरा जीवन चेहरे के रंग रोगन मे लगा देते हैं! कभी आप उनकी वास्तविकता भी देखे कितना बनावटी सफर हैं उन सभी का। जो दिखते है वो होता नहीं और जो असल होता हैं वो दिखता नहीं। भाई लोग उसी पर मर मिटते हैं। रॉबर्ट ब्राउनिंग ने कहा है, ‘ग्रो ओल्ड अलॉन्ग विद मी, द बेस्टइज येट टुबी।’ जीवन का सफर उम्र के साथ तय करो, अभी सर्वोत्तम घटित होना बाकी है। स्वस्थ रहना सर्वोत्तम है। हां! शरीर सबका अलग है, तो जीवन स्थितियां भी एक जैसी नहीं। उम्र का बढ़ना कुदरती सच है, इसे सहजता से स्वीकार करना जरूरी है।**

☀️शिवजी के 108 नाम‼️

️ॐ✴️~नमो आदिशंकरमहादेव~✴️ॐ️
*༺꧁‼️हर हर हरे हरे‼️꧂༻*
*°30°*

◾कल्याण स्वरूप, अनंत, अनादि, अनीश्वर, देवों के देव महादेव को किस नाम से पुकारा जाए? अजर, अमर, अविनाशी-शिवजी के अनगिनत नाम हैं और उसकी व्याख्या अनन्त। इस ब्रह्मांड मे जितने भी दृश्य-अदृश्य नाम-शब्द हैं सब उन्ही के हैं। कुछ भी उनसे अछूता नहीं। जिसे जड़-चेतन, जन्म-मृत्यु, नामधारी चेतन-शरीर एवं शव कहते हैं वो भी उन्हीं का नाम हैं। इस ब्रम्हांड मे कोई ऐसा नहीं जो उनकी कथा का पार पा सके। वेद भगवान भी हाथ खड़ा कर देते हैं नेति नेति..कहते हैं। यहां तक कि त्रिदेव भी उनका पार नहीं पाते फिर इंसानों की बात ही क्या हैं। सबकी अपनी अपनी दलील हैं कोई कुछ कहता-कोई कुछ? कोई कहता प्रकाश तो कोई अंधकार। कोई कहता – “हैं” तो कोई कहता “नहीं” हैं। कोई राम कहता तो कोई कहता वो रहीम हैं। कोई अल्लाह कहता तो कोई ईश्वर..? सब सही हैं। बहुत छोटा करके अगर कहूं तो यही कह सकता हूँ..सब “शिव” हैं (सर्वम)..जो बुद्धि की पहुंच से परे हैं जो अति सुक्ष्म भी हैं और व्यापक भी..उसका क्या नाम दे सकते हैं। जो अव्यक्त, अनाम हैं। इस सृष्टि मे जितने भी नाम हैं सब शिव के ही पर्याय हैं।

◾उन शिवजी के अनगिनत नामों में कुछ एक 108 चमत्कारिक नामों की प्रचलित माला नीचे प्रस्तुत करने की कोशिश करता हूँ। ॐ तत्सत ॐ शिव !!

ॐ शिवाय नमः
ॐ महेश्वराय नमः
ॐ शंभवे नमः
ॐ पिनाकिने नमः
ॐ शशिशेखराय नमः
ॐ वामदेवाय नमः
ॐ विरूपाक्षाय नमः
ॐ कपर्दिने नमः
ॐ नीललोहिताय नमः
ॐ शंकराय नमः
ॐ शूलपाणये नमः
ॐ खट्वांगिने नमः
ॐ विष्णुवल्लभाय नमः
ॐ शिपिविष्टाय नमः
ॐ अंबिकानाथाय नमः
ॐ श्रीकण्ठाय नमः
ॐ भक्तवत्सलाय नमः
ॐ भवाय नमः
ॐ शर्वाय नमः
ॐ त्रिलोकेशाय नमः
ॐ शितिकण्ठाय नमः
ॐ शिवा प्रियाय नमः
ॐ उग्राय नमः
ॐ कपालिने नमः
ॐ कामारये नमः
ॐ अन्धकासुरसूदनाय नमः
ॐ गंगाधराय नमः
ॐ ललाटाक्षाय नमः
ॐ कालकालाय नमः
ॐ कृपानिधये नमः
ॐ भीमाय नमः
ॐ परशुहस्ताय नमः
ॐ मृगपाणये नमः
ॐ जटाधराय नमः
ॐ कैलाशवासिने नमः
ॐ कवचिने नमः
ॐ कठोराय नमः
ॐ त्रिपुरान्तकाय नमः
ॐ वृषांकाय नमः
ॐ वृषभारूढाय नमः
ॐ भस्मोद्धूलितविग्रहाय नमः
ॐ सामप्रियाय नमः
ॐ स्वरमयाय नमः
ॐ त्रयीमूर्तये नमः
ॐ अनीश्वराय नमः
ॐ सर्वज्ञाय नमः
ॐ परमात्मने नमः
ॐ सोमसूर्याग्निलोचनाय नमः
ॐ हविषे नमः
ॐ यज्ञमयाय नमः
ॐ सोमाय नमः
ॐ पंचवक्त्राय नमः
ॐ सदाशिवाय नमः
ॐ विश्वेश्वराय नमः
ॐ वीरभद्राय नमः
ॐ गणनाथाय नमः
ॐ प्रजापतये नमः
ॐ हिरण्यरेतसे नमः
ॐ दुर्धर्षाय नमः
ॐ गिरीशाय नमः
ॐ गिरिशाय नमः
ॐ अनघाय नमः
ॐ भुजंगभूषणाय नमः
ॐ भर्गाय नमः
ॐ गिरिधन्वने नमः
ॐ गिरिप्रियाय नमः
ॐ कृत्तिवाससे नमः
ॐ पुरारातये नमः
ॐ भगवते नमः
ॐ प्रमथाधिपाय नमः
ॐ मृत्युंजयाय नमः
ॐ सूक्ष्मतनवे नमः
ॐ जगद्व्यापिने नमः
ॐ जगद्गुरुवे नमः
ॐ व्योमकेशाय नमः
ॐ महासेनजनकाय नमः
ॐ चारुविक्रमाय नमः
ॐ रुद्राय नमः
ॐ भूतपतये नमः
ॐ स्थाणवे नमः
ॐ अहिर्बुध्न्याय नमः
ॐ दिगंबराय नमः
ॐ अष्टमूर्तये नमः
ॐ अनेकात्मने नमः
ॐ सात्विकाय नमः
ॐ शुद्धविग्रहाय नमः
ॐ शाश्वताय नमः
ॐ खण्डपरशवे नमः
ॐ अजाय नमः
ॐ पाशविमोचकाय नमः
ॐ मृडाय नमः
ॐ पशुपतये नमः
ॐ देवाय नमः
ॐ महादेवाय नमः
ॐ अव्ययाय नमः
ॐ हरये नमः
ॐ भगनेत्रभिदे नमः
ॐ अव्यक्ताय नमः
ॐ दक्षाध्वरहराय नमः
ॐ हराय नमः
ॐ पूषदन्तभिदे नमः
ॐ अव्यग्राय नमः
ॐ सहस्राक्षाय नमः
ॐ सहस्रपदे नमः
ॐ अपवर्गप्रदाय नमः
ॐ अनन्ताय नमः
ॐ तारकाय नमः
ॐ परमेश्वराय नमः ***


                          

☀️एक क्षण के सत्संग का प्रभाव‼️

️ॐ✴️~नमो आदिशंकरमहादेव~✴️ॐ️
*༺꧁‼️हर हर हरे हरे‼️꧂༻*
*°29°*

◾भगवान की कथा, सतविचार, साधु का संग हो या सत्संग, जीवन को उन्नत-अच्छाई की ओर ही ले जाती है। अच्छे संस्कार भी जीवन में आते है अपने साथ समाज का भी कल्याण होता है। जीवन का अर्थ समझ मे आने लगते हैं। अनगिनत जन्मों को पाप कटने लगता हैं। चित्त शुद्ध होने लगता हैं। इसी पर एक छोटा दृष्टान्त !!

*༺‼️#प्रपंच_से_परे_है_वो_शिव_हैं‼️༻*

◾एक राजा के यहाँ एक चोर चोरी करने गया तो सिपाही ने देख लिया और जब उसका पीछा किया तो वो चोर भगाने लगा। रास्ते में एक सन्त सत्संग कर रहे थे लोग बैठे थे उसी संगत में वह चोर जाकर बैठ गया और बस इतना ही सुना कि देवी-देवता के परछाई नहीं होती है इतना सुनकर मौका पाकर भाग गया। लेकिन सिपाही ने पकड़ लिया और राजा के सामने ले गया। चोर मानने को तैयार नहीं था कि उसने चोरी की। राजा की कुलगुरु ने कहा कि ये चोर लोग काली मां के भगत होते है काली मां के रूप में किसी को भेजकर देखो ये जरूर अपना जुर्म अपना लेगा। हुआ भी यही एक को काली मां के रूप में भेजा गया फिर चोर जैसे ही अपना सच कबूल करने वाला था कि उसे परछाई नजर आ गई फिर वो समझ गया कि ये सच में काली मां नहीं है उसके बाद उसने अपना जुर्म नहीं माना फिर राजा को उस चोर को छोड़ना पड़ा गया। उस चोर ने सन्त की बात को याद किया फिर उसे लगने लगा कि सन्त की एक वाक्य से उसका जीवन बच गया तो अनेक वाक्य से जीवन ही बदल जाएगा उसके बाद उसने अपना जीवन प्रभु के कार्य में लगा दिया समाज के कल्याण में अपना जीवन लगा दिया।

◾दोस्तों, आने वाले हमारे दुर्भाग्य को बदलने के लिए दुःख को काटने के लिए प्रभु हमारे जीवन में  अपने सत कर्मों की कथा-सत्संग के माध्यम से भेजते है लेकिन ये दुर्भाग्य है हम उसका पूरा लाभ नहीं ले पाते है। क्योंकि थोड़ी ही देर मे फिर से प्रपंच हावी हो जाता। हम फिर से वही सब करने लगते है। इसलिए सत् संगत को अपने जीवन मे उतरना आवश्यक हैं। वैसे तो अच्छी बाते बहुत कम मित्रों को पसंद आतीं हैं। विलासिता, राजनीति, दुनियादारी, कम कपड़े की अश्लील चित्र, ठुमके आदि मित्रों को ज्यादा पसंद आता हैं। लाइक कमेन्ट की संख्या भी कही लाखों मे होती हैं। सत्य..स्वतः सिद्ध है इसलिए बहुत कम लोगों को पसंद आता हैं। क्योंकि आज सभी ज्ञानी हैं। अब जो नए शिशु हैं वो माँ के गर्भ मे मोबाइल ज्ञान सीख कर आ रहे हैं। आते ही गाड़ी की स्टेयरिंग सम्भाल रहे हैं।

◾फिर भी कोशीश करने मे क्या हर्ज हैं। कहते हैं जब सभी रास्ते बंद हो जाते हैं तो उस समय सत्संग और आपके अच्छे कर्म ही साथ देता हैं। इसलिए समय को बर्बाद न करते हुए सत संगत से नित्य जुड़े रहें और साथ में अन्य को भी जरूर सन्देश भेजे बिना इस धारणा के कोई लाइक करेगा या नहीं। अपना कर्म करना चाहिए। भूखे को सत्संग की प्यास लगती हैं मालदार को नही। पर कब फ्री की पुड़िया जरूरत पर काम आ जाये कह नहीं सकते।**

☀️”माँ”…‼️(अंतिम भाग)

️ॐ✴️~नमो आदिशंकरमहादेव~✴️ॐ️
*༺꧁‼️हर हर हरे हरे‼️꧂༻*
*°28°*

◾ईश्वर ने हमें जो सबसे अनमोल उपहार दिया है, वह है माँ। मां से बढ़कर दुनिया में कुछ भी नहीं है। माँ, अम्मी, मम्मी, माम, माँई, मदर..ऐसे ही कितने नामों से हम अपनी माँ को पुकारते हैं । जब हम इस दुनिया में आए और हमने पहली बार बोलना सीखा तो मुख से निकलने वाला पहला शब्द था माँ…। माँ हमारे जीवन का एक ऐसा वरदान है जो हमें जन्म के साथ मिला है। माँ ही पिता की पहचान सर्वप्रथम कराती हैं। वही प्रथम गुरू हैं जो रिश्ते- नाते संसार मे रहने का सलीका सिखाती हैं। दुनियां से परिचय कराती हैं।

◾माँ के लिए जितना भी कहां-लिखा जाये वो कम है। माँ औरत का एक ऐसा किरदार है, जिसमें संपूर्णता, पवित्रता, त्याग, ममता, प्यार सब कुछ निहित होता है। शायद ही दुनिया का कोई अन्य रिश्ता ऐसा हो, जिसमें इतनी सारी खूबियाँ एक साथ सधती होती हों। मां एक बच्चे के लिए सबसे अमूल्य उपहार है।  मां अपने आप में पूर्ण संस्कारवान, मनुष्यत्व व सरलता के गुणों का सागर है। पिता का अपना महत्तवपूर्ण किरदार हैं। जिस पर पूरे गृहस्थी का बोझ होता हैं। हर दर्द सहकर भी सदा मुस्कराता रहता हैं। पूरी गृहस्थी को धूप, बरसात, दुनियां आदि ऋतुओं की मार सहकर भी सबको सुरक्षित रखता हैं। एक मजबूत वृक्ष की तरह सबका ढाल बन खड़ा रहता हैं। वो बाहर से जितना कठोर अंदर से उतना ही भावुक भी होता हैं पर कभी प्रदर्शित नहीं करता।

◾पर इस कलयुग मे कुछ अपवाद भी हैं कोई कोई मनचली माँ ऐसी भी हैं जो अपने बच्चे को छोड़कर अपने सुविधा के लिए किसी दूसरे का दामन थाम लेती हैं। जिससे इंकार नहीं किया जा सकता। उन्हें माँ की संज्ञा नहीं दी जा सकती। ठीक ऐसे ही कुछ मनचलें पिता भी हैं जो अपनी अच्छी-बुरी गृहस्थी को छोड़ अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए, सपनों को पूरा करने हेतु अपनों को छोड़ पलायन कर जाते हैं। उन्हें भी पिता की संज्ञा नहीं दी जा सकती। मुर्ख ये नही जानते कि जो वो कर रहे हैं वो भी एक सपना ही हैं।

एक कदम आध्यात्म की ओर..