15/☑️प्रयास से हार नहीं‼️

🛑दोस्तों, यदि लगन और प्रयास हो तो हम सब आफत में भी सफलता हासिल कर सकते हैं। गरीबी हमे आगे बढ़ने से नहीं रोक पाती। समाज मे बहुत से ऐसे उदाहरण हैं। अति गरीब और पिछड़े बच्चे थे माँ- बाप मजदूर! परन्तु बच्चे अपने लगन-पुरुषार्थ और अपने माता-पिता के आशीर्वाद से अपने क्षेत्र मे औरो से बहुत आगे निकल गए। ऐसे पुरुषार्थयों से मध्यवर्ग के उन माता- पिता को जरूर सबक लेना चाहिए, जिन्हें लगता है कि जब तक बच्चे किसी नामी-गिरामी स्कूल में नहीं पढ़ेंगे, तब तक वे कुछ कर ही नहीं सकते। इसके लिए उनकी गुंजाइश हो न हो, वे बड़़े-बड़े स्कूलों की तरफ भागते हैं। कर्ज भी लेना पड़े, तो बच्चों की ऊंची फीस भरते हैं। दिल्ली सहित अन्य शहरों में यह मारामारी बहुत दिखाई देती है। आज के दिन में, जब बहुत से लोगों की नौकरियां चली गई हैं, वे बातचीत में पहली चिंता यही प्रकट करते हैं कि अब बच्चों की हजारों की फीस और ऊपरी खर्चे कहां से देंगे ?

🛑बच्चे को किसी सरकारी स्कूल में भेजना नहीं चाहते । समाज और जान- पहचान वालों में हंसी उड़ेगी, सो अलग। इसके अलावा माता-पिता सोचते हैं कि जिन कठिनाइयों का सामना उन्होंने अपने बचपन में किया था, वे अपने बच्चों को उनसे बचाएं। इसीलिए वे बच्चे की हर इच्छा पूरी करने की कोशिश करते हैं, जबकि अनेक विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों को मुश्किलों का सामना करना सिखाना चाहिए, क्योंकि माता- पिता उनकी मदद करने के लिए हमेशा नहीं रहेंगे। इस दुनिया का सामना उन्हें अपने दम पर ही करना होगा। यह भी कहा जाता है कि जिन बच्चों ने कभी कठिनाइयां नहीं देखीं, यदि उनके सामने अचानक मुश्किलें आएं, तो वे उनका सामना नहीं कर पाते हैं। वे उनसे दूर भागते हैं। कई बार अवसाद का शिकार हो जाते हैं। और आत्महत्या जैसे घातक कदम भी उठा लेते हैं।

⚫गांधीजी अपनी पुस्तक सत्य के प्रयोग में अनेक परेशानियों का जिक्र करते हैं, पर कभी घुटने नहीं टेकते हैं। परेशानियों का सामना करने का हौसला उनमें हमेशा दिखाई देता है। किसी भी बड़ी हस्ती को बनाने में चुनौतियों का बड़ा हाथ होता है। इसी तरह से भूतपूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का उदाहरण है। बताया जाता है कि नदी पार करके उन्हें स्कूल जाना पड़ता था। वह तैरकर नदी पार करते थे। जाहिर है, मल्लाह को देने के लिए पैसे नहीं रहे होंगे। जब वह प्रधानमंत्री बने, तब भी उनके पास बहुत मामूली कपड़े थे। उन्हें फटे कपड़े पहनने से भी परहेज नहीं था। उन्होंने पद के कारण अपने रहन-सहन और सादगी से कोई समझौता नहीं किया। इस तरह की कथाओं से हमारा इतिहास भरा पड़ा है। सादगी एक बड़ा जीवन मूल्य है। पंक्ति के अंतिम आदमी की चिंता ने भी इसे हमेशा बनाए रखा है। अपने बड़े नेताओं के संघर्ष और उनकी सफलता से भी तो बहुत कुछ सीखा जा सकता है पर आजकल हम दिखावा, प्रदर्शन करने वाले सोहनलाल द्विवेदी की मशहूर पंक्तियां हैं, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती..?°°°

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°°°•••✳️॥>!धन्यवाद!<॥✳️•••°°°

14/☑️हौसलों से जीत‼️

🛑कई बार हम समस्याओं का सामना करते-करते थक जाते हैं। ऐसे में, हमें निराशा घेर लेती है। तब हम समझ नहीं पाते कि क्या सही है, और क्या गलत। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी रास्ता ढूंढ़ लेते हैं।

🛑एक बार नेपोलियन ने आल्पस पर्वत पार करके इटली में प्रवेश करने की योजना बनाई और सेना के साथ आगे बढ़ने लगा। अंततः सेना के सामने वह पर्वत आया, उस पर चढ़ाई करना लगभग नामुमकिन लग रहा था। सेना में हलचल सी पैदा हो गई। लेकिन नेपोलियन ने सेना को चढ़ाई का आदेश दिया। उसके इस आदेश को पास में ही खड़ी एक बुजुर्ग महिला सुन रही थी। वह नेपोलियन के पास आकर बोली, ‘क्या मरना चाहते हो? यहां जितने भी लोग आए, वे मुंह की खाकर गए। अगर अपनी जिंदगी प्यारी है, तो यहीं से लौट जाओ।’

⚫बुजुर्ग की बातें सुनकर नेपोलियन के चेहरे पर एक चमक आ गई। वह क्रोधित होने के बजाय प्रेरित हो गया। अपने गले से कीमती हार उतारकर उस बुजुर्ग महिला को पहनाते हुए बोला, ‘मैं आपका शुक्रगुजार हूं। आपने मेरा उत्साह बढ़ाकर इस काम को करने के लिए प्रेरित किया है। अगर मैं जीवित बच गया, तो आप मेरी जय-जयकार अवश्य करना।’ नेपोलियन की बातें सुनकर उस महिला ने कहा, तुम पहले इंसान हो, जो मेरी बातें सुनकर हताश और निराश नहीं हुआ।’ फिर नेपोलियन ने सफलतापूर्वक आल्पस पर्वत पर चढ़ाई करके इटली को जीत लिया। गीतकार संतोष आनंद ने उचित ही कभी कहा था कि-हौसला जीतता है, हथियार नहीं। सदैव याद रखें जो लोग कठिनाइयों का सामना करने का इरादा रखते हैं, वे कभी नहीं हारते।°°°

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13/☑️प्रश्न तो उठेंगे‼️

🎯प्रश्न ??..तो उठेंगे कभी अपने से कभी औरों से अनगिनत..रोक नहीं सकते !? प्रश्न और उत्तर वहां विलीन हो जाते हैं जब उस पूर्ण से पूर्णतया जुड़ जाते हैं..जहां ना कोई प्रश्न हैः ना ही कोई उत्तर न कुछ अज्ञेय !!

☑️शिव‼️

🎯“शिव”..सबसे प्यारे, सबसे निराले, शांत, भोले, राम जी की तरह रोम रोम मे बसाने वाले, कृष्ण जी की तरह आकर्षित करते है “शिव”!!

🎯प्रचंड है शिव, अखंड है शिव, अघोर है शिव, वियोग है शिव, नित्य भी अनित्य भी “शिव”…!! प्रेम, श्रद्धा, विश्वास और भक्ति है “शिव”..!!

☑️सेवक‼️

🎯सेवक हो तो सेवक की तरह से रहो सृष्टि का रहनुमा या मालिक बनने की कोशिश ना करो। बहुत काल के गर्त मे चलें गये। खाद और राख बन गये। नामों निशाँ भी ढूढ़ने से नही मिलता। अब तुम्हारी बारी हैं। जब एक बच्चा भी दूध के लिए रोता है तो उसकी आवाज़ परमात्मा तक पहुंचती है बेवकूफ़। फिर तुम किस खेत की मूली हो। तुम्हें सेवक किसने बनाया इस पर भी विचार करो। बनाने वाला कैसे रहता है यह भी सोचों।°°°

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°°°•••✳️॥>!धन्यवाद!<॥✳️•••°°°

12/☑️ब्रह्मा-जी के कमंडल से गंगा‼️   

🛑एक प्रफुल्लित सुंदर युवती का जन्म ब्रह्मदेव के कमंडल से हुआ। इस जन्म के बारे में दो विचार हैं। एक की मान्यता है कि वामन रूप में राक्षस बलि से संसार को मुक्त कराने के बाद ब्रह्मदेव ने भगवान विष्णु का चरण धोया और इस जल को अपने कमंडल में भर लिया। दूसरे का संबंध भगवान शिव से है जिन्होंने संगीत के दुरूपयोग से पीड़ित राग-रागिनी का उद्धार किया। जब भगवान शिव ने नारद मुनि ब्रह्मदेव तथा भगवान विष्णु के समक्ष गाना गाया तो इस संगीत के प्रभाव से भगवान विष्णु का पसीना बहकर निकलने लगा जो ब्रह्मा ने उसे अपने कमंडल में भर लिया। इसी कमंडल के जल से गंगा का जन्म हुआ और वह ब्रह्मा के संरक्षण में स्वर्ग में रहने लगी।

🛑दोस्तों, माँ गंगा, एक नदी ही नहीं, भारतीय संस्‍कृति की एक गौरवशाली सरिता है। देवनदी, जाह्नवी, विष्‍णुपदा, शिवशीशधारिणी जैसे कोई 108 नाम इस नदी के हैं। ‘महाभागवत’ में ‘गंगा अष्‍टोत्‍तरशत नामावली’ मिलती है। यह इस नदी के पुण्‍य का ही प्रभाव है कि पातकी से पातकी तक इस नदी में निमज्‍जन से पुण्‍यश्‍लोकी हुआ है। यह ऐसी नदी है जिसका जिक्र ऋग्‍वेद से लेकर वर्तमान साहित्‍य तक में मिल जाता है। राजा भागीरथ के तप के प्रभाव से यह अलकनंदा से भगीरथी होकर भारत के कलिकलुष को धोती हई महासमुद्रगामी हुई। गंगा दशहरा या गंगादशमी का पर्व 10वीं सदी पूर्व से ही मनाया जाता रहा है। भोजराज ने ‘राजमार्तण्‍ड’ में दशपापों के निवारण के पर्व के रूप में इस दिवस का स्‍मरण किया है।

जो दस पाप हरे, वह यह पर्व है। इन पापों का जिक्र सर्वप्रथम मनु ने अपनी स्‍मृति में किया है, जिनको यथारूप ‘स्‍कंदपुराणकार’ सहित अन्‍य पुराण, उपपुराणकारों ने भी उद्धृत किया है। मूर्तिकला में गंगा की अभिव्‍यक्ति नई नहीं है। गुप्‍तकाल से ही स्‍त्री रूप में यह नदी कलशधारिणी नायिका के रूप में उत्‍कीर्ण की जाने लगी। विशेषकर द्वारशाखा के नीचे मूर्तिमय रूप में गंगा का न्‍यास मिलता है। अनेक रूपों और अनेक भावों में यह नदी रूप देवालय के दर्शनार्थियों को अपनी उपस्थिति से पापमुक्ति, कलुषहारिणी का संकेत देती है। एक ओर यमुना, दूसरी ओर गंगा। इन का समन्‍वय पश्चिम और पूर्वी संस्‍कृतियों का संगम भी माना जाता है। कोई भी भाषा, धर्म-विचार हो, यहां अंतत: एकता का दर्शन होता है। इसलिए भारत की संस्‍कृति को गंगा-जमनी भी कहा जाता है। पर प्रश्न वही खड़ा हैं हमने धर्म के नाम पर या अधर्म से स्वार्थ बस माँ गंगा के साथ क्या बर्ताव किया?? विचार अवश्य करें।***

*༺✴️‼️#प्रपंच_से_परे_वो_शिव_हैं‼️✴️༻* 
*༺⚜️꧁✴️‼️#शिवशरणम#‼️✴️꧂⚜️༻*
°°°•••✳️॥>!धन्यवाद!<॥✳️•••°°°

             

11/☑️राजा सगर की कथा‼️

🛑गंगा नदी के साथ अनेक पौराणिक कथाएँ जुड़ी हुई हैं। इनमें से एक वैष्णव पंथ द्वारा रचित राजा सगर की कथा है। इसके अनुसार ब्रह्मा ने विष्णु के पैर के पसीनों की बूँदों से गंगा का निर्माण किया। एक अन्य कथा के अनुसार राजा सगर ने जादुई रूप से साठ हजार पुत्रों की प्राप्ति की। एक दिन राजा सगर ने देवलोक पर विजय प्राप्त करने के लिये एक यज्ञ किया। यज्ञ के लिये घोड़ा आवश्यक था जो ईर्ष्यालु इंद्र ने चुरा लिया था। सगर ने अपने सारे पुत्रों को घोड़े की खोज में भेज दिया अंत में उन्हें घोड़ा पाताल लोक में मिला जो एक ऋषि के समीप बँधा था। सगर के पुत्रों ने यह सोच कर कि ॠषि ही घोड़े के गायब होने की वजह हैं उन्होंने ऋषि का अपमान किया।

🛑तपस्या में लीन ॠषि ने हजारों वर्ष बाद अपनी आँखें खोली और उनके क्रोध से सगर के सभी साठ हजार पुत्र जल कर वहीं भस्म हो गये। सगर के पुत्रो की आत्माएँ भूत बनकर विचरने लगे क्योंकि उनका अंतिम संस्कार नहीं किया गया था। सगर के पुत्र अंशुमान ने आत्माओं की मुक्ति का असफल प्रयास किया और बाद में अंशुमान के पुत्र दिलीप ने भी। भगीरथ राजा दिलीप की दूसरी पत्नी के पुत्र थे। उन्होंने अपने पूर्वजों का अंतिम संस्कार किया। उन्होंने गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रण किया जिससे उनके संस्कार की राख गंगाजल में प्रवाह कर भटकती आत्माएं स्वर्ग में जा सके। भगीरथ ने ब्रह्मा की घोर तपस्या की ताकि गंगा को पृथ्वी पर लाया जा सके।

ब्रह्म जी प्रसन्न हुये और गंगा को पृथ्वी पर भेजने के लिये तैयार हुये और गंगा को पृथ्वी पर और उसके बाद पाताल में जाने का आदेश दिया ताकि सगर के पुत्रों के आत्माओं की मुक्ति संभव हो सके। तब गंगा ने कहा कि मैं इतनी ऊंचाई से जब पृथ्वी पर गिरूंगी, तो पृथ्वी इतना वेग कैसे सह पाएगी? तब भगीरथ ने भगवान शिव से निवेदन किया और उन्होंने अपनी खुली जटाओं में गंगा के वेग को रोक कर, एक लट खोल दी, जिससे गंगा की अविरल धारा पृथ्वी पर प्रवाहित हुई। वह धारा भगीरथ के पीछे पीछे गंगा सागर संगम तक गई, जहां सगर-पुत्रों का उद्धार हुआ। शिव के स्पर्श से गंगा और भी पावन हो गयी और पृथ्वी वासियों के लिये बहुत ही श्रद्धा का केन्द्र बन गयीं। पुराणों के अनुसार स्वर्ग में गंगा को मन्दाकिनी और पाताल में भागीरथी कहते हैं।°°°

*༺꧁‼️हर हर हरे हरे‼️꧂༻*
°°°•••✳️॥>!धन्यवाद!<॥✳️•••°°°

एक कदम आध्यात्म की ओर..