511/☑️करवट: तीसरी👁️आँख‼️

🛑मूर्ख सरकार जो समस्त विवाद की जड़ हैं; जिस कन्धे का इस्तेमाल कर रही हैं वो कन्धे यदि अपना पल्ला नहीं झाड़े; पृथक नहीं हुए तो उनका भी पतन निश्चित हैं !!***

(कोई भी मित्र कमेन्ट ना करें सिर्फ ध्यान दे!)

🛑#कुछ_मूर्ख_महात्वाकांक्षी पूंजीपतियों एवं कट्टरपंथी संस्थाओ द्वारा प्रायोजित वर्तमान सरकार ने काम कम; अपनी पीठ ज्यादा थपथपाई; काम कम; पीड़ित जनता का दोहन सैकड़ों गुना किया। काम कम; प्रचार हजार गुना ज्यादा किया! काम कम; विपक्ष-विपक्ष ज्यादा किया। काम कम; हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद ज्यादा किया।

🛑वर्तमान कम इतिहास ज्यादा परोसा। जनता की बात अनसुनी कर अपने मन की बात ज़्यादा सुनाई। इतिहास भोजन की व्यवस्था नहीं करता। क्या सोचा सत्ता बपौती हो जाएगी। तुम्हारी मनमानी चलेगी। आज 700 से ज्यादा किसान अपनी शहादत दे चुके! संख्या बढ़ती ही जा रही हैं। काल तांडव आहुतियां ले रहा हैं।

🛑लाखों लोग प्रायोजित कोरोंना के मात्र भय और तुम्हारे कुटिल बुद्धि से मृत्यु को प्राप्त हुए। देश का अरबों रुपया दबाई कंपनियां और अस्पतालों को चला गया। लाखों की नौकरी, काम व्यवसाय चले गयैं। हज़ारों निर्दोष को जेल मे बंद कर दिया। टैक्स, महगाई, सड़क और यातायात पर ना जाने कितने गुना जुर्माना राशि बढ़ा दी। मास्क ना लगाने पर भी लोगों से मनमानी पैसे लिए।

🛑कितनी गाड़ियां गलियों मे खड़ी हो गयी जिन पर कर्ज था। कितनो ने अपनी रोजी-रोटी के लिए अनेक निम्न समझौते किए। कितने छोटे व्यवसाय ठप हो गए। बार्डर पर कितने जवानों को शहीद करवाया उनके घर उजड़ गए। देश की जीडीपी गर्त में चली गयी। देश ज्यादा कर्जदार हो गया। पीड़ित लोगों पर शीर्ष महंगाई की कई गुना मार! पूरे देश की आबादी को भीख लेने पर मजबूर किया। फिर भी पेट नहीं भरा?

🛑विपत्ति काल मे तुमने किसानों के लिए फंदा तैयार किया; लाखों मजदूरों को सड़क पर ला दिया और दिखाते रहे 18-20 घंटे काम। फोटो खिंचवाने, प्रचार, लूट कानून और साजिश करने के अलावा किया ही क्या! अनगिनत गुनाह किए। झूठ-छल का सहारा लेकर देश का अपने ऊपर से भरोसा तोड़ दिया। अब अपनी वाहवाही मे बहुत आगे निकल गए। भारत को चाइना समझने की भूल कर बैठे। अपने थोथें ज्ञान का भरपूर उपयोग किया शाम दाम दण्ड नीति और धर्म का अनुचित प्रयोग अपने फायदे के लिए लोगों को छोटे-बड़े किसान मे बांटने मे किया। सभी वर्ग धर्म को बांटने की भरपूर कोशिश की।

🛑अब तुम्हारे पास कोई ब्रह्मास्त्र नहीं बचा। सभी तीर नाकाम और पुनः वापिस तुम्हीं को घायल कर रहे हैं। और भी जो साजिश या कोशीश कर सकते हो कर लो! अब तो आत्मसुधार का विकल्प भी नहीं बचा। होनी को कौन टाल सकता हैं। पाप का घड़ा शीघ्र ही भरने वाला हैं। उल्टी गिनती चालू हैं। कुछ ही वक्त शेष हैं चांदनी एक घनघोर अंधेरा सन्नाटा का रूप ले लेगी।

🛑जिस विपक्ष के नाम पर 24 घंटा राजनीति होती हैं कितनों पर आरोप सिद्ध कर पाए जबकि पूरी तंत्र तुम्हारे शिकंजे मे हैं। देश का पैसा लेकर भागे कितनों को वापस लाए। दाऊद का क्या हुआ। अनगिनत सवाल हैं जो तुम्हें तुम्हारी अंतरात्मा को खाये जा रहे हैं। कानून तो लेकर आए पर दशकों से चल रहें बेहूदे आरक्षण पर क्या किया! जिसकी वज़ह से कुपात्र आज ऊंचे पदों पर ऐश की पीढ़ियों तक रोटी सेक रहे हैं। उसके आड़ मे सब कुछ गिरवी रख तुमने सवर्णों को बेवकूफ़ बनाने की कोशिश की।

🛑स्टैचू-मूर्तियों से देश का भाग्योदय नहीं होता मूर्खों। सबका साथ सबका विकास सबका विश्वास के नारे ने तुम्हारी पोल खोल दी। सब अपना कर लिया। इस सभी के गुनाह तुम्हारे सर पर हैं। हवाई जहाज खरीदा पर बचकर किस दुनियां मे जाओगे। काल हर जगह हैं! आज देश पूछ रहा हैं! हिसाब मांग रहा हैं। हिसाब देना होगा तुम्हें और तुम्हारे उन कंधों को जिसके बल पर तुम्हारे नेतृत्व का मुखौटा रूपी सिक्का चल रहा हैं।

🛑देश सेवा का संकल्प लेने से पहले कभी अपने माता-पिता की सेवा किए होते तो आज ईश्वर अवश्य सद्बुद्धि देते पर ऐसा नहीं हुआ। वहां भी कैमरे पर प्रयोग मात्र किया। हर जगह सिर्फ धंधा नहीं होता। तुम जो सांसे ले रहे हो वो उस हवा की कीमत नहीं ले रहा। वो अपने पर आ गया तो चमड़ी भी नहीं बचने वाली।

🛑सभी विपक्ष को भी अपने पुराने कार्यकलाप, तुष्टीकरण, परिवारवाद, लूट, सत्ता के दुरुपयोग के हिसाब का अवलोकन करना चाहिए। अपने गिरेबान मे झांको। तुम्हारी ही करनी देश भुगत रहा हैं। तुम्हीं इसके कारण भी हो। बचोंगे तुम भी नहीं। यह युद्ध हैं सिर्फ स्वरूप बदला हैं। तुम भी उतने ही दोषी हो जितना वर्तमान सत्तातंत्र। सभी नौकरशाहों को भी सबक लेना चाहिए। प्रकृति कभी माफ नहीं करती सब हिसाब यही होता हैं। सत्ता हो; विपक्ष या अन्य कोई यदि गलत करेगा तो उन सभी को तीसरी शक्ति चैन से सोने नहीं देगी आपस मे ही एक दूसरे लड़ मरोगे। वो समय गया जब मलाई खाते थे।

🛑जितना आज तक बनाया उसका सुख तुम्हारे नसीब मे नही होगा ! जागरूक शक्ति शीघ्र दौड़ा दौड़ा कर जूते भी मारने वाली हैं क्योंकि वो शक्ति पीड़ित जनता, किसानों के रूप मे जागृत और तुम्हारे कार्यकलापों पर नजर बनाए हुए अति क्रोध मे हैं। खेल जारी हैं। जिसे काल स्वरूप भयंकर शिवा रूप काली कहते हैं वो विकराल रूप मे संघर्ष के साथ खड़ी हैं और बृहद रूप धारण करती जा रही है।

🛑यह आवाज उन करोड़ों जागृत पीड़ित लोगों की हैं जिसके गुहार से तीसरी शक्ति जागृत हुई हैं। यह लड़ाई लंबी चलेगी और राजनीति से अलग होकर सभी सत्ता तंत्र वो चाहे पक्ष हो या विपक्ष अहंकारी सत्तासीन नशेड़ीयौं के साथ उनके बहुआयामी तंत्र पर एक दिन नकेल कसेगी।

आने वाले समय मे अलग-बगल झांकता असमंजस की स्थिति मे खड़ा कुछ भ्रमित सवर्ण; ब्राहमण और साधु समाज का भी जागरण होगा। असर उनपर भी पड़ेगा। वो भी तीसरी शक्ति का साथ देगें। समय के साथ सब बदलाव होगा। सभी निष्पक्ष और जागृत होंगे। सत्ता के सभी घटक टूटते जाएंगे। ये कोई भविष्यवाणी नहीं बल्कि यथार्थ हैं आपके आत्मा की आवाज़ हैं सिर्फ उंगलिया “शिव” मेरे आराध्य के इस पेज की हैं। याद रखें।***

!! धन्यवाद !!

510/☑️सच्चे साधू‼️

🥀नह्मम्भयानि तीर्थानि न देवाःमृच्छिलामयाः।
                ते पुनंति उरुकालेन ॥
🥀दर्शनाद् एव साधवः तेषाम् एव।
       निवासेन देशास्तीर्थ भवन्ति वै॥ (भागवत)
      
🛑अर्थात: जल से तीर्थ नहीं बनते; न देवता मिट्टी और पत्थर से बनते हैं; उनकी उपासना करने से बहुत काल में मन की शुद्धि होती है; पर सच्चे साधुओं के दर्शन और सत्संग से ही चित्त सद्यःशुद्ध हो जाता है॥

🥀भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं विभो।
  तीर्थी कुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःसृथेन गदाभृता॥
 
🛑अर्थात: युधिष्ठिर विदुर जी से कहते हैं; आप जैसे भक्त स्वयं ही तीर्थ रुप होते हैं। आप लोग अपने हृदय में विराजित भगवान के द्वारा; तीर्थों को महातीर्थ बनाते हुये विचरण करते हैं। सच्चे सन्त ॒ महामानव ही तीर्थ की महिमा बढ़ाने वाले होते हैं॥
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!! धन्यवाद !!

509/☑️सब एक समान‼️

🛑एक दृष्टान्त के अनुसार एक बार मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम और भ्राता लक्ष्मण एक सरोवर में स्नान के लिए उतरे। उतरते समय उन्होंने अपने-अपने धनुष बाहर तट पर गाड़ दिए जब वे स्नान करके बाहर निकले तो लक्ष्मण ने देखा की उनकी धनुष की नोक पर रक्त लगा हुआ था! उन्होंने भगवान राम से कहा -” भ्राता ! लगता है कि अनजाने में कोई हिंसा हो गई।” दोनों ने मिट्टी हटाकर देखा तो पता चला कि वहां एक मेढ़क मरणासन्न पड़ा है।

🛑भगवान राम ने करुणावश मेंढक से कहा- “तुमने आवाज क्यों नहीं दी ? कुछ हलचल, छटपटाहट तो करनी थी। हम लोग तुम्हें बचा लेते जब सांप पकड़ता है तब तुम खूब आवाज लगाते हो। धनुष लगा तो क्यों नहीं बोले ? मेंढक बोला – प्रभु! जब सांप पकड़ता है तब मैं ‘राम- राम’ चिल्लाता हूं एक आशा और विश्वास रहता है, प्रभु अवश्य पुकार सुनेंगे। किन्तु आज देखा कि साक्षात भगवान श्री राम स्वयं धनुष लगा रहे है तो किसे पुकारता? आपके सिवा किसी का नाम याद नहीं आया बस इसे अपना सौभाग्य मानकर चुपचाप सहता रहा।”

दृष्टान्त सार: -सच्चे भक्त जीवन के हर क्षण को भगवान का आशीर्वाद मानकर उसे स्वीकार करते हैं। अच्छा-बुरा सब समान समझते हैं। सुख और दुःख प्रभु की ही कृपा और कोप का परिणाम ही तो हैं।***

!! धन्यवाद !!

508/☑️विजया-दशमी (दशहरा)‼️

🛑दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत की ख़ुशी में मनाया जाने वाला त्यौहार हैं। सामान्यतः दशहरा एक जीत के जश्न के रूप में मनाया जाने वाला त्यौहार हैं। जश्न की मान्यता सबकी अलग-अलग होती हैं। जैसे किसानो के लिए यह नयी फसलों के घर आने का जश्न हैं। पुराने वक़्त में इस दिन औजारों एवम हथियारों की पूजा की जाती थी, क्यूंकि वे इसे युद्ध में मिली जीत के जश्न के तौर पर देखते थे। लेकिन इन सबके पीछे एक ही कारण होता हैं बुराई पर अच्छाई की जीत! किसानो के लिए यह मेहनत की जीत के रूप में आई फसलो का जश्न एवम सैनिको के लिए युद्ध में दुश्मन पर जीत का जश्न हैं! लेकिन आजकल किसान और जवान अपने-अपने मोर्चों पर डटें हैं ?

🛑दशहरा अश्विन माह की शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाता है। यह नवरात्र खत्म होते ही अगले दिन आने वाला त्योंहार है। इसे विजय पर्व या विजयदशमी के रूप में भी मनाया जाता है। भारत में कुछ जगहों पर इस दिन रावण को जलाया नहीं जाता बल्कि उसकी पूजा भी की जाती है। यह जगह इस प्रकार है – कर्नाटक के कोलार, मध्यप्रदेश के मंदसौर, राजस्थान के जोधपुर, आंध्रप्रदेश के काकीनाडा और हिमाचल के बैजनाथ इत्यादि जगहों पर रावण की पूजा की जाती है। दशहरा के दिन के पीछे कई कहानियाँ हैं, जिनमे सबसे प्रचलित कथा हैं। भगवान राम का युद्ध जीतना अर्थात रावण की बुराई का विनाश कर उसके घमंड को तोड़ना।

🛑राम अयोध्या नगरी के राजकुमार थे। उनकी पत्नी का नाम सीता था एवम उनके छोटे भाई थे। जिनका नाम लक्ष्मण था. राजा दशरथ राम के पिता थे। उनकी पत्नी कैकई के कारण इन तीनो को चौदह वर्ष के वनवास के लिए अयोध्या नगरी छोड़ कर जाना पड़ा. उसी वनवास काल के दौरान रावण ने सीता का अपहरण कर लिया।

🛑रावण चतुर्वेदो का ज्ञाता महाबलशाली राजा था। जिसकी सोने की लंका थी, लेकिन उसमे अपार अहंकार था। वो महान शिव भक्त था और खुद को भगवान विष्णु का दुश्मन बताता था। वास्तव में रावण के पिता विशर्वा एक ब्राह्मण थे एवं माता राक्षस कुल की थी, इसलिए रावण में एक ब्राह्मण के समान ज्ञान था एवम एक राक्षस के समान शक्ति और इन्ही दो बातों का रावण में अहंकार था। जिसे ख़त्म करने के लिए भगवान विष्णु ने रामावतार लिया था।

🛑राम ने अपनी सीता को वापस लाने के लिए रावण से युद्ध किया, जिसमे वानर सेना एवम हनुमान जी ने राम का साथ दिया। इस युद्ध में रावण के छोटे भाई विभीषण ने भी भगवान राम का साथ दिया और अन्त में भगवान राम ने रावण को मार कर उसके घमंड का नाश किया। इसी विजय के स्वरूप में प्रति वर्ष विजियादशमी मनाई जाती हैं।

☑️दशहरा पर्व से जुड़ी कथाएं –
1. राम की रावन पर विजय का पर्व।
2. राक्षस महिसासुर का वध कर दुर्गा माता विजयी हुई थी।
3. पांडवों का वनवास।
4. देवी सती अग्नि में समां गई थी।

🛑आज के समय में दशहरा इन पौराणिक कथाओं को माध्यम मानकर मनाया जाता हैं। माता के नौ दिन की समाप्ति के बाद दसवे दिन जश्न के तौर पर मनाया जाता हैं। जिसमे कई जगहों पर राम लीला का आयोजन होता है, जिसमे कलाकार रामायण के पात्र बनते हैं और राम-रावण के इस युद्ध को नाटिका के रूप में प्रस्तुत करते हैं। कई जगहों पर इस दिन मैला लगता है, जिसमे कई दुकाने एवम खाने पीने के आयोजन होते हैं। उन्ही आयोजनों में नाट्य नाटिका का प्रस्तुतिकरण किया जाता हैं।

🛑इस दिन घरों में लोग अपने वाहनों को साफ़ करके उसका पूजन करते हैं. व्यापारी अपने लेखा का पूजन करते हैं। किसान अपने जानवरों एवम फसलो का पूजन करता हैं। इंजिनियर अपने औजारों एवम अपनी मशीनों का पूजन करते हैं। इस दिन घर के सभी पुरुष एवम बच्चे दशहरे मैदान पर जाते हैं। वहाँ रावण, कुम्भकरण एवम रावण पुत्र मेघनाथ के पुतले का दहन करते है। सभी शहर वासियों के साथ इस पौराणिक जीत का जश्न मनाते हैं। मैले का आनंद लेते हैं. उसके बाद शमी पत्र जिसे सोना चांदी कहा जाता हैं उसे अपने घर लाते हैं। घर में आने के बाद द्वार पर घर की स्त्रियाँ, तिलक लगाकर आरती उतारकर स्वागत करती हैं। माना जाता हैं कि मनुष्य अपनी बुराई का दहन करके घर लौटा है, इसलिए उसका स्वागत किया जाता हैं। इसके बाद वो व्यक्ति शमी पत्र देकर अपने से बड़ो के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेता हैं। इस प्रकार घर के सभी लोग आस पड़ोस एवम रिश्तेदारों के घर जाकर शमी पत्र देते हैं एवम बड़ो से आशीर्वाद लेते हैं। छोटो को प्यार देते हैं एवम बराबरी वालो से गले मिलकर खुशियाँ बाटते हैं।

🛑अगर एक पंक्ति में कहे तो यह पर्व आपसी रिश्तो को मजबूत करने एवम भाईचारा बढ़ाने के लिए होता हैं, जिसमे मनुष्य अपने मन में भरे घृणा एवम बैर के मेल को साफ़ कर एक दुसरे से एक त्यौहार के माध्यम से मिलता हैं। इस प्रकार यह पर्व भारत के बड़े- बड़े पर्व में गिना जाता हैं एवम पुरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैं। हमारे देश में धार्मिक मान्यताओं के पीछे बस एक ही भावना होती हैं, वो हैं प्रेम एवं सदाचार की भावना। यह पर्व हमें एकता की शक्ति याद दिलाते हैं जिन्हें हम समय की कमी के कारण भूलते ही जा रहे हैं। ऐसे में यह त्यौहार ही हमें अपनी नींव से बाँधकर कर रखते हैं।

यह बुरे आचरण पर अच्छे आचरण की जीत की ख़ुशी में मनाया जाने वाला त्यौहार हैं। सामान्यतः दशहरा एक जीत के जश्न के रूप में मनाया जाने वाला त्यौहार हैं. जश्न की मान्यता सबकी अलग-अलग होती हैं। जैसे किसानो के लिए यह नयी फसलों के घर आने का जश्न हैं। पुराने वक़्त में इस दिन औजारों एवम हथियारों की पूजा की जाती थी, क्यूंकि वे इसे युद्ध में मिली जीत के जश्न के तौर पर देखते थे। लेकिन इन सबके पीछे एक ही कारण होता हैं बुराई पर अच्छाई की जीत। किसानो के लिए यह मेहनत की जीत के रूप में आई फसलो का जश्न एवम सैनिको के लिए युद्ध में दुश्मन पर जीत का जश्न हैं।

*रावण अगर जलाना है तो…
*पहले अपना अहम जलाओ,
*क्रोधित मत हो वहम जलाओ,
*रावण मर जायेगा जल कर।  (ईर्ष्या)
*साधु नही मन संत बनाओ!
*राम राज्य गर लाना है तो,
*रावण अगर जलाना है तो,,,

!! शुभकामनाओं सहित, धन्यवाद !!

507/☑️श्री भगवान‼️

🛑भगवान् श्रीराम के सौन्दर्य को देखकर विदेह राजा जनक भी विदेह अर्थात् देह की सुध-बुध से रहित हो जाते हैं।

“भूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी।

🔘और कहने लगते हैं..?

सहज बिरागरूप मनु मोरा!थकित होत जिमि चंद चकोरा”

🔘वन में रहने वाले कोल-भील भी भगवान् के विग्रह को देखकर मुग्ध हो जाते हैं!

“करहिं जोहारु भेंट धरि आगे!
प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे !!
“चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े!
पुलक सरीर नयन जल बाढ़े !! मानस

प्रेमियों की तो बात ही क्या, वैर भाव रखने वाले राक्षस खर-दूषण भी भगवान् के श्री विग्रह की सुन्दरता को देखकर चकित हो जाते हैं और कहते हैं-

नाग असुर सुर नर मुनि जेते ! देखे जिते हते हम केते !
हम भरि जन्म सुनहु सब भाई!देखी नहिं असि सुंदरताई !!

तात्पर्य है कि भगवान् के दिव्य सौन्दर्य की ओर प्रेमी,
विरक्त, ज्ञानी, मूर्ख, वैरी, असुर और राक्षस तक सबका मन आकृष्ट हो जाता है।

‘सम्भवाम्यात्ममायया’-जो मनुष्य भगवान् से विमुख रहते हैं, उनके सामने भगवान् अपनी योगमाया में छिपे रहते हैं और साधारण मनुष्य-जैसे ही दीखते हैं। मनुष्य ज्यों-ज्यों भगवान् के सम्मुख होता जाता है, त्यों-त्यों भगवान् उसके सामने प्रकट होते जाते हैं। इसी योगमाया का आश्रय लेकर भगवान् विचित्र-विचित्र लीलाएँ करते हैं। भगवत विमुख मूढ़ पुरुष के आगे दो परदे रहते हैं एक तो अपनी मूढ़ता का और दूसरा भगवान् की योगमाया का! अपनी मूढ़ता रहने के कारण भगवान् का प्रभाव साक्षात् सामने प्रकट होने पर भी वह उसे समझ नहीं सकता; जैसे—द्रौपदी का चीर-हरण करने के लिये दुःशासन अपना पूरा बल लगाता है, उसकी भुजाएँ थक जाती हैं, पर साड़ी का अन्त नहीं आता –

द्रुपद सुता निरबल भइ ता दिन, तजि आये निज धाम ।
दुस्सासन की भुजा थकित भई, बसन-रूप भए स्याम ॥

इस प्रकार भगवान् ने सभा के भीतर अपना ऐश्वर्य साक्षात् प्रकट कर दिया। परन्तु अपनी मूढ़ता के कारण दुःशासन, दुर्योधन, कर्ण आदि पर इस बात का कोई असर ही नहीं पड़ा कि द्रौपदी के द्वारा भगवान् को पुकारने मात्र से कितनी विलक्षणता प्रकट हो गयी! एक स्त्री का चीरहरण भी नहीं कर सके तो और क्या कर सकते हैं! इस तरफ उनकी दृष्टि ही नहीं गयी। भगवान् का प्रभाव सामने देखते वे उसे जान नहीं सके। यदि जीव अपनी मूढ़ता (अज्ञान) दूर कर दे तो उसे अपने स्वरूप का अथवा परमात्म तत्त्व का बोध तो हो जाता है, पर भगवान् के दर्शन नहीं होते । भगवान् के दर्शन तभी होते हैं, जब भगवान् अपनी योग माया का परदा हटा देते हैं। अपना अज्ञान मिटाना तो जीव के हाथ की बात है, पर योगमाया को दूर करना उसके हाथ की बात नहीं है। वह सर्वथा भगवान् के शरण हो जाय तो भगवान् अपनी शक्ति से उसका अज्ञान भी मिटा सकते हैं और दर्शन भी दे सकते हैं। भगवान् जितनी लीलाएँ करते हैं, सब योगमाया का आश्रय लेकर ही करते हैं। इसी कारण उनकी लीला को देख सकते हैं, उसका अनुभव कर सकते हैं। यदि वे योगमाया का आश्रय न लें तो उनकी लीला को कोई देख ही नहीं सकता, उसका आस्वादन कोई कर ही नहीं सकता।***

!! धन्यवाद !!

एक कदम आध्यात्म की ओर..